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Tafsīr ath-Thaʿālibī · An-Najm
सूरह 53

An-Najm

الجواهر الحسان في تفسير القرآن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयतें 55–58

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكَ تَتَمَارَىٰ 55 هَـٰذَا نَذِيرٌ مِّنَ ٱلنُّذُرِ ٱلْأُولَىٰٓ 56 أَزِفَتِ ٱلْـَٔازِفَةُ 57 لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ ٱللَّهِ كَاشِفَةٌ 58

وقوله سبحانه: فَبِأَيِّ آلاءِ رَبِّكَ تَتَمارى مخاطبة للإنسان الكافر كأَنَّه قيل له: هذا هو اللَّه الذي له هذه الأفعال، وهو خالِقُكَ المُنْعِمُ عليكَ بكُلِّ النِّعَمِ، ففي أَيّها تشك وتتمارى؟! معناه: تتشكك، وقال مالك الغفاريُّ: إنَّ قوله: أَلَّا تَزِرُ إلى قوله:

تَتَمارى هو في صحف إِبراهيم وموسى.

وقوله سبحانه: هذا نَذِيرٌ يحتمل أَنْ يشير إلى نبيّنا محمّد ﷺ، وهو قول قتادة وغيره [[أخرجه الطبري (11/ 540) برقم: (32656) ، وذكره البغوي (4/ 256) ، وذكره ابن عطية (5/ 209) ، والسيوطي في «الدر المنثور» (6/ 172) ، وعزاه لعبد بن حميد، وابن المنذر.]] ، وهذا هو الأشبه، ويحتمل أنْ يشير إلى القرآن، وهو تأويل قوم، ونَذِيرٌ يحتمل أَنْ يكونَ بناء اسم فاعل، ويحتمل أَنْ يكون مصدراً، ونُذُر جمع نذير.

وقوله تعالى: أَزِفَتِ الْآزِفَةُ معناه: قربت القريبة، والآزفة: عبارة عن القيامة بإجماعٍ من المفسرين، وأَزِفَ معناه قَرُبَ جدًّا قال كَعْبُ بْنُ زُهَيْرٍ: [البسيط]

بَانَ الشَّبَابُ وَآهَا الشَّيْب قَدْ أَزِفَا ... ولا أرى لشباب ذاهب خلفا [[وبعده:

عاد السواد بياضا في مفارقه ... لا مرحبا ها بذا اللون الذي ردفا

ينظر: «ديوانه» (70) ، «المحرر الوجيز» (5/ 210) .]] ،

وكاشِفَةٌ يحتمل أَنْ تكون صفة لمؤنث التقدير: حال كاشفة ونحو هذا التقدير، ويحتمل أَنْ تكونَ بمعنى: كاشف قال الطبريُّ [[ينظر: «تفسير الطبري» (11/ 541) .]] والزَّجَّاج: هو من كشف السّرّ، أي: ليس من دون الله من يكشف وَقْتَهَا ويعلمه، وقال منذر بن سعيد [[ذكره ابن عطية (5/ 209) .]] : هو من كشف الضُّرّ ودفعه، أي: ليس مَنْ يكشف خطبها وهولها إلّا الله.