At-Tawba
تيسير الكريم الرحمنयह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।
पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया
وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ٱئْذَن لِّى وَلَا تَفْتِنِّىٓ ۚ أَلَا فِى ٱلْفِتْنَةِ سَقَطُوا۟ ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ 49
{49} أي: ومن هؤلاء المنافقين من يستأذن في التخلُّف ويعتذر بعذرٍ آخر عجيب، فيقول:{ائذن لي}: في التخلُّف، {ولا تَفۡتِنِّي}: في الخروج؛ فإني إذا خرجت فرأيت نساء بني الأصفر لا أصبر عنهن؛ كما قال ذلك الجدُّ بن قيس، ومقصوده قبَّحه الله الرياء والنفاق؛ بأن مقصودي مقصودٌ حسن؛ فإنَّ في خروجي فتنةً، وتعرضاً للشرِّ، وفي عدم خروجي عافيةً وكفًّا عن الشرِّ. قال الله تعالى مبيِّناً كذب هذا القول:{ألا في الفتنةِ سَقَطوا}: فإنه على تقدير صدق هذا القائل في قصدِهِ؛ في التخلُّف مفسدةٌ كبرى وفتنةٌ عظمى محقَّقة، وهي معصية الله ومعصية رسوله والتجرِّي على الإثم الكبير والوزر العظيم، وأما الخروجُ؛ فمفسدةٌ قليلة بالنسبة للتخلُّف، وهي متوهَّمة، مع أنَّ هذا القائل قصده التخلُّف لا غير، ولهذا توعَّدهم الله بقوله:{وإنَّ جهنَّم لمحيطةٌ بالكافرين}: ليس لهم عنها مَفَرٌّ ولا مناصٌ ولا فكاكٌ ولا خلاصٌ.