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Tafsīr as-Saʿdī · At-Tawba
सूरह 9

At-Tawba

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 101

وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْأَعْرَابِ مُنَـٰفِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ ٱلْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا۟ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍ 101

{101} يقول تعالى: {وممَّن حولَكم من الأعراب منافقون ومن أهل المدينة}: أيضاً منافقون، {مَرَدُوا على النِّفاق}؛ أي: تمرَّنوا عليه [واستمرّوا] وازدادوا فيه طغياناً، {لا تعلَمُهم}: بأعيانهم فتعاقبهم أو تعاملهم بمقتضى نفاقهم؛ لما لله في ذلك من الحكمة الباهرة. {نحن نعلمُهم سنعذِّبهم مرتينِ}: يُحتمل أن التثنية على بابها، وأنَّ عذابَهم عذابٌ في الدنيا وعذابٌ في الآخرة؛ ففي الدُّنيا ما ينالهم من الهمِّ والغمِّ والكراهة لما يصيب المؤمنين من الفتح والنصر، وفي الآخرة عذابُ النار وبئس القرار، ويُحتمل أنَّ المراد سنغلِّظُ عليهم العذاب، ونضاعفه عليهم، ونكرِّره.