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Tafsīr as-Saʿdī · Fussilat
सूरह 41

Fussilat

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयतें 45–46

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَٱخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِى شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ 45 مَّنْ عَمِلَ صَـٰلِحًا فَلِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ أَسَآءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّـٰمٍ لِّلْعَبِيدِ 46

{45} يقول تعالى: {ولقد آتَيۡنا موسى الكتابَ}: كما آتَيْناك الكتابَ، فصنع به الناسُ ما صنعوا معك؛ اختلفوا فيه: فمنهم من آمنَ به واهتدى وانتفع، ومنهم من كذَّبه ولم ينتفِعْ به، وإنَّ الله تعالى لولا حِلْمُهُ وكلمتُهُ السابقة بتأخير العذاب إلى أجل مسمّى لا يتقدَّم عليه ولا يتأخر؛ {لَقُضِيَ بينهم}: بمجرَّد ما يتميَّز المؤمنون من الكافرين؛ بإهلاك الكافرين بالحال؛ لأنَّ سبب الهلاك قد وَجَبَ وحقَّ. {وإنَّهم لَفي شكٍّ منه مريبٍ}؛ أي: قد بلغ بهم إلى الريبِ الذي يُقْلِقُهم؛ فلذلك كذَّبوه وجحدوه.

{46}{مَن عَمِلَ صالحاً}: وهو العملُ الذي أمر الله به ورسوله {فَلِنَفۡسِهِ}: نفعه وثوابه في الدنيا والآخرة. {ومن أساء فعليها}: ضررُه وعقابُه في الدُّنيا والآخرة، وفي هذا حثٌّ على فعل الخير وترك الشرِّ، وانتفاعُ العاملين بأعمالهم الحسنةِ، وضررُهم بأعمالهم السيئةِ، وأنَّه لا تزِرُ وازرةٌ وِزْرَ أخرى. {وما ربُّك بظلام للعبيدِ}: فيحمِّلُ أحداً فوق سيئاتِهِ.