An-Noor
تيسير الكريم الرحمنयह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।
पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया
ٱلزَّانِيَةُ وَٱلزَّانِى فَٱجْلِدُوا۟ كُلَّ وَٰحِدٍ مِّنْهُمَا مِا۟ئَةَ جَلْدَةٍ ۖ وَلَا تَأْخُذْكُم بِهِمَا رَأْفَةٌ فِى دِينِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَآئِفَةٌ مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ 2
{2} هذا الحكم في الزاني والزانية البكرين: أنَّهما يُجلد كلٌّ منهما مائة جلدةٍ، وأما الثيِّب؛ فقد دلَّت السنة الصحيحة المشهورة أنَّ حدَّه الرجم.
ونهانا تعالى أن تأخُذَنا رأفةٌ بهما في دين الله تمنعُنا من إقامة الحدِّ عليهما، سواء رأفة طبيعيَّة، أو لأجل قرابة أو صداقة أو غير ذلك، وأنَّ الإيمان موجبٌ لانتفاء هذه الرأفة المانعة من إقامة أمرِ الله؛ فرحمتُه حقيقةً بإقامة الحدِّ عليه، فنحنُ وإن رَحِمْناه لِجَرَيان القدر عليه؛ فلا نَرْحَمُه من هذا الجانب.
وأمَرَ تعالى أن يَحْضُرَ عذابَ الزانيين {طائفةٌ}؛ أي: جماعة من المؤمنين؛ ليشتهر ويحصُلَ بذلك الخزي والارتداع، وليشاهدوا الحدَّ فعلاً؛ فإنَّ مشاهدة أحكام الشرع بالفعل مما يَقْوى به العلم، ويستقرُّ بها الفهم، ويكونُ أقربَ لإصابة الصواب؛ فلا يزادُ فيه ولا ينقص. والله أعلم.