Al-Baqara
تيسير الكريم الرحمنयह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।
पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ كَمَآ ءَامَنَ ٱلنَّاسُ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ كَمَآ ءَامَنَ ٱلسُّفَهَآءُ ۗ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلسُّفَهَآءُ وَلَـٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ 13
{13} أي: إذا قيل للمنافقين آمنوا كما آمن الناس، أي:
كإيمان الصحابة رضي الله عنهم وهو: الإيمان بالقلب واللسان، قالوا بزعمهم الباطل: أنؤمن كما آمن السفهاء؟ يعنون ـ قبحهم الله ـ الصحابة
رضي الله عنهم؛ لزعمهم أن سفههم أوجب لهم الإيمان، وترك الأوطان، ومعاداة الكفار، والعقل عندهم
يقتضي ضد ذلك، فنسبوهم إلى السَفَه، وفي ضمن ذلك أنهم هم العقلاء أرباب الحجى والنُهى؛ فرد الله ذلك
عليهم وأخبر أنهم هم السفهاء على الحقيقة؛ لأن حقيقة السفه جهل الإنسان بمصالح نفسه، وسعيه فيما
يضرها، وهذه الصفة منطبقة عليهم، [وصادقة عليهم] كما أن العقل والحجى معرفة
الإنسان بمصالح نفسه والسعي فيما ينفعه وفي دفع ما يضره، وهذه الصفة منطبقة على الصحابة والمؤمنين؛
فالعبرة بالأوصاف والبرهان، لا بالدعاوي المجردة والأقوال الفارغة.