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Tafsīr as-Saʿdī · Al-Israa
सूरह 17

Al-Israa

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 22

لَّا تَجْعَلْ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَّخْذُولًا 22

{22} أي: لا تعتقدْ أنَّ أحداً من المخلوقين يستحقُّ شيئاً من العبادة، ولا تشركْ بالله أحداً منهم؛ فإنَّ ذلك داع للذمِّ والخذلان؛ فالله وملائكته ورسله قد نَهَوْا عن الشرك، وذمُّوا من عمله أشدَّ الذمِّ، ورتَّبوا عليه من الأسماء المذمومة والأوصاف المقبوحة ما كان به متعاطيه أشنعَ الخلق وصفاً وأقبحهم نعتاً، وله من الخِذْلان في أمر دينه ودنياه بحسب ما تركه من التعلُّق بربِّه؛ فمن تعلَّق بغيره؛ فهو مخذولٌ قد وُكِلَ إلى مَن تعلَّق به، ولا أحد من الخلق ينفع أحداً إلا بإذن الله؛ وكما أنَّ مَن جعل مع الله إلهاً آخر له الذمُّ والخذلان؛ فمن وحَّده وأخلص دينه لله، وتعلَّق به دون غيره؛ فإنَّه محمودٌ مُعانٌ في جميع أحواله.