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Tafsīr as-Saʿdī · Ar-Ra'd
सूरह 13

Ar-Ra'd

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 32

وَلَقَدِ ٱسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَأَمْلَيْتُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ 32

{32} يقول تعالى لرسوله مثبِّتاً له ومسلياً: {ولقد استُهۡزِئ برسل من قبلِكَ}: فلستَ أوَّلَ رسول كُذِّب وأوذِيَ. {فأمليتُ للذين كفروا}: برسلهم؛ أي: أمهلتهم مدة حتى ظنُّوا أنَّهم غيرُ معذَّبين، {ثم أخذتُهم}: بأنواع العذاب. {فكيف كان عقابِ}: كان عقاباً شديداً وعذاباً أليماً؛ فلا يغترَّ هؤلاء الذين كذَّبوك واستهزؤوا بك بإمهالنا؛ فلهم أسوةٌ فيمن قبلهم من الأمم، فليحذَروا أن يُفْعَلَ بهم كما فُعِلَ بأولئك.