सीधे कंटेंट पर जाएँ
Tafsīr al-Qurṭubī · Al-Fath
सूरह 48

Al-Fath

الجامع لأحكام القرآن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 14

وَلِلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا 14

وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّماواتِ وَالْأَرْضِ يَغْفِرُ لِمَنْ يَشاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشاءُ وَكانَ اللَّهُ غَفُوراً رَحِيماً (١٤) أَيْ هُوَ غَنِيٌّ عَنْ عِبَادِهِ، وَإِنَّمَا ابْتَلَاهُمْ بِالتَّكْلِيفِ لِيُثِيبَ مَنْ آمَنَ وَيُعَاقِبَ مَنْ كَفَرَ وعصى.